🛕 श्रीमद्‍भगवद्‍ गीता 🛕

गजेंद्र मोक्ष - गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र | gajendra moksha

गजेंद्र मोक्ष

गजेंद्र मोक्ष हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण पौराणिक कथा है, जो विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है। यह कथा भक्ति, श्रद्धा और प्रभु की कृपा पर आधारित है। विशेष रूप से यह कथा जीवन में आने वाली कठिनाइयों से मुक्ति पाने और भगवान की शरण में जाने की प्रेरणा देती है।
gajendra-moksha

गजेंद्र मोक्ष की कथा

एक समय की बात है, त्रिकूट पर्वत पर गजेंद्र नामक एक शक्तिशाली हाथी अपने परिवार के साथ जलाशय में स्नान कर रहा था। अचानक, एक विशाल मगरमच्छ ने गजेंद्र के पैर को पकड़ लिया और उसे गहरे पानी में खींचने लगा। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष किया, लेकिन मगरमच्छ की पकड़ मजबूत थी।
जब गजेंद्र को एहसास हुआ कि वह अपनी शक्ति से बच नहीं सकता, तब उसने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपनी सूंड में एक कमल का फूल लेकर उनकी स्तुति की। उसने गजेंद्र स्तोत्र का उच्चारण किया और अपनी पूरी श्रद्धा से भगवान को पुकारा। उसकी भक्ति और समर्पण को देखकर भगवान विष्णु तुरंत गरुड़ पर सवार होकर आए और अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया। गजेंद्र को संकट से मुक्त कराकर भगवान ने उसे मोक्ष प्रदान किया।

गजेंद्र स्तोत्र और उसका महत्व

हिंदू धर्म के अनुसार, गजेंद्र स्तोत्र का उल्लेख श्रीमद्भगवद गीता के तीसरे अध्याय में मिलता है। इस स्तोत्र में कुल 33 श्लोक दिए गए हैं, जिनका जाप करने से व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार की कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है और यह सिखाता है कि ईश्वर की शरण में जाने से ही सच्ची मुक्ति संभव है।
गजेन्द्रमोक्ष-स्तोत्र
नित्य पाठ के लिए मूल पाठ
श्री शुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनोहृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥1॥
गजेन्द्र उवाच
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।
पुरुषायादिबीजा परेशायाभिधीमहि ॥2॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥3॥
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्व च तत् तिरोहितम् ।
अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥4॥
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदाऽऽसीद् गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥5॥
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥6॥
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम्
विमुक्तसंगाः मुनयः सुसाधवः।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥7॥
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा
न नामरूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥8॥
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥१॥
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥10॥
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥11॥
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥12॥
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥13॥
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥14॥
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय
निष्कारणायाद्भुत कारणाय।
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय
नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥15॥
गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥16॥
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥17॥
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥18॥
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम्॥19॥
एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम्
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥20॥
तमक्षरं ब्रह्मपरं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥21॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥22॥
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।
तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥23॥
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्
न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥24॥
जिजीविषे नाहिमहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥25॥
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥26॥
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥27॥
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥28॥
नायं वेद स्वमात्मनं यच्छक्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥29॥
श्री शुक उवाच
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात्
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥30॥
तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान-
श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥31॥
सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-
नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥32॥
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम्॥33॥
gajendra-moksha
ॐ श्री परमात्मने नमः

गजेन्द्र मोक्ष

गजेन्द्र ने इस स्तोत्र द्वारा किसी देवी-देवता को नहीं पुकारा, क्योंकि वह जानता था कि वे विभिन्न कामनाओं को पूर्ण करते हैं। यदि जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना है, तो जगत् के कारणरूप निर्गुण-निराकार पर सगुण-साकार का स्मरण ही श्रेष्ठ है। श्री विष्णु तत्व की उपासना से सत्वगुण का अंत:करण में जागरण होता है, जिससे तत्व ज्ञान की उपलब्धि होती है। यह स्तोत्र शरीर के स्तर पर होने वाले कष्ट से प्रारंभ होता है लेकिन यह इसका ही प्रभाव है कि बाद में गजेन्द्र समस्त कष्टों से मुक्ति की भगवान से याचना करता है। स्तोत्र और प्रार्थना का यही अलौकिक माहात्म्य है।

गजेन्द्र मोक्ष अर्थ सहित

श्री शुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनोहृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥

भावार्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं, परीक्षित्! अपनी बुद्धि से ऐसा निश्चय करके कि भगवान की शरण ही जीव मात्र का आश्रय है, गजेन्द्र ने अपने मन को हृदय में (भावपूर्वक) एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्म में सीखे हुए श्रेष्ठ (भगवान के गुणों, माहात्म्य और ऐश्वर्य से युक्त) स्तोत्र के जप द्वारा भावपूर्वक अजस्रधारा की तरह अपने इष्ट भगवान् की स्तुति करने लगा ॥१॥
गजेन्द्र उवाच
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥

भावार्थ: गजेन्द्र ने कहा– जो जगत् के मूल कारण हैं और सबके हृदय में पुरुष के रूप में विराजमान हैं एवं समस्त जगत् के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण इस संसार में चेतना का विस्तार होता है, उन भगवान् को मैं नमस्कार करता हूं, प्रेम पूर्वक मैं उनका ध्यान करता हूं ॥२॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥

भावार्थ: यह संसार उन्हीं में स्थित है, उन्हीं की सत्ता से प्रतीत हो रहा है, वे ही इसमें व्याप्त हैं और वे स्वयं ही इस रूप में प्रकट हो रहे हैं। यह सब होने पर भी वे इस संसार और इसके कारण - प्रकृति से सर्वथा परे हैं अर्थात कारण होते हुए भी कारण नहीं हैं। उन स्वयं प्रकाश, स्वयं सिद्ध सत्तात्मक भगवान् की मैं शरण ग्रहण करता हूं- उनकी शरण में हूं ॥३॥
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद् विभातं क्व च तत् तिरोहितम् ।
अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥

भावार्थ: यह विश्व-प्रपंच उन्हीं की माया से उनमें अध्यस्त है। यह कभी प्रतीत होता है, तो कभी नहीं। परन्तु उनकी दृष्टि एक-सी रहती है। वे इसके साक्षी हैं और प्रकृति तथा प्रलय इन दोनों ही परिस्थितियों को ही देखते रहते हैं। वे सबके मूल हैं। इतना ही नहीं, अपने मूल भी वे स्वयं ही हैं। कोई दूसरा उनका कारण नहीं है। समस्त कार्य और कारणों से अतीत वह प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदाऽऽसीद् गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥

भावार्थ: प्रलय के समय जब लोक, लोकपाल और इन सबके कारण सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं, उस समय चारों ओर अत्यन्त गहन अन्धकार रहता है, परन्तु अनन्त परमात्मा उससे सर्वथा परे विराजमान रहते हैं। वे ही प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥

भावार्थ: उनकी लीलाओं का रहस्य जानना अत्यंत कठिन है। वे नट की तरह अनेक वेषों को धारण करते हैं। उनके स्वरूप को न तो देवता जानते हैं, न ही ऋषि, फिर कौन ऐसा प्राणी है, जो वहां तक जा सके और उसका वर्णन कर सके, वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम्
विमुक्त संगाः मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥

भावार्थ: जिनके परम मंगलमय स्वरूप का दर्शन करने के लिये महात्मा संसार की सभी आसक्तियों का परित्याग कर देते हैं और वन में जाकर अखण्डभाव से ब्रह्मचर्य आदि दिव्य व्रतों का पालन करते हैं तथा अपने आत्मा को सबके हृदय में विराजमान देखकर जो सबकी भलाई करते हैं- वे सहजरूप से मुनियों के सर्वस्व भगवान् मेरे सहायक हों, वे ही मेरी गति हैं ॥७॥
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा
न नामरूपे गुणदोष एव वा।
तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥

भावार्थ: न तो उनके जन्म-कर्म हैं और न ही नाम रूप, फिर उनके बारे में गुण-दोष की कल्पना कैसे की जा सकती है? फिर भी इस संसार की सृष्टि और इसका संहार करने के लिए समय-समय पर जो उन्हें अपनी माया से स्वीकार करते हैं (वो प्रभु मेरी रक्षा करें) ॥८॥
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥

भावार्थ: उन्हीं अनन्त शक्ति से सम्पन्न और सभी प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त परब्रह्म परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं। वे अरूप होने पर भी अनेक रूपों वाले हैं। उनके कर्म अत्यन्त आश्चर्यमय हैं। मैं उनके चरणों में नमस्कार करता हूं ॥९॥
नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥

भावार्थ: स्वयं प्रकाश और सबके साक्षी परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं। मन, वाणी और चित्त से अत्यन्त दूर स्थित परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं ॥१०॥
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥

भावार्थ: विवेकी पुरुष कर्म-संन्यास अथवा कर्म-समर्पण के द्वारा अपना अन्त:करण शुद्ध करने के बाद जिन्हें प्राप्त करते हैं तथा जो स्वयं तो नित्यमुक्त, परमानन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं ही, दूसरों को भी कैवल्य - मुक्ति देने की सामर्थ्य भी (केवल) जिनमें है - उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूं ॥११॥
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥

भावार्थ: जो सत्त्व, रज, तम - इन तीन गुणों के धर्मों को स्वीकार करने के बाद क्रमश: शान्त, घोर और मूढ़ अवस्थाओं को धारण करते हैं, उन भेद रहित समभाव से स्थित एवं ज्ञानघन प्रभु को मैं बार-बार नमस्कार करता हूं ॥१२॥
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥

भावार्थ: हे प्रभो! आप सबके स्वामी, समस्त क्षेत्रों के एक मात्र ज्ञाता एवं सर्वसाक्षी हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूं। आप स्वयं ही अपने कारण हैं। पुरुष और मूल प्रकृति के रूप में भी आप ही अस्तित्ववान हैं, आपको मेरा बार-बार नमस्कार ॥१३॥
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥

भावार्थ: हे प्रभो! आप समस्त इन्द्रिय और उनके विषयों के द्रष्टा हैं, समस्त प्रतीतियों के आधार हैं। अहंकार आदि छायारूप असत् वस्तुओं की सत्ता के रूप में भी केवल आप ही प्रतीत हो रहे हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूं।
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय
निष्कारणायाद्भुतकारणाय ।
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय
नमोऽपवर्गाय परायणायः ॥

भावार्थ: आप सबके मूल कारण हैं, आपका कोई कारण नहीं है तथा कारण होने पर भी आपमें विकार या परिणाम नहीं होता, इसलिये आप अनोखे कारण हैं अर्थात कारण होने पर भी कारण नहीं हैं, ऐसे आपको मेरा बार-बार नमस्कार! जैसे समस्त नदी-झरने आदि का परम आश्रय समुद्र है, (समुद्र में जाकर ही वे शांत होते हैं) वैसे ही आप समस्त वेद और शास्त्रों के परम तात्पर्य हैं (उनकी सार्थकता, उनका लक्ष्य आपके गुणानुवाद में ही है)। आप मोक्षस्वरूप हैं और समस्त संत आपकी ही शरण ग्रहण करते हैं; अतः आपको नमस्कार करता हूं ॥१५॥
गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥

भावार्थ: जैसे यज्ञ के काष्ठ अरणि में अग्नि गुप्त (छुपी) रहती है, वैसे ही आपने अपने ज्ञान को गुणों की माया से ढक रखा है (सामान्यतौर पर वह प्रकट नहीं होता। उसे प्रकट करने के लिए विशेष आयोजन और प्रयास की आवश्यकता हुआ करती है)। सत्यत्व आदि गुणों में क्षोभ होने पर उनके द्वारा विविध प्रकार की सृष्टि रचना का आप संकल्प करते हैं। जो लोग कर्म-संन्यास अथवा कर्म-समर्पण के द्वारा आत्मतत्त्व की भावना करके वेद-शास्त्रों से ऊपर उठ जाते हैं (जिन पर शास्त्रों के विधि-निषेध लागू नहीं होते), उनके आत्मा के रूप में आप स्वयं ही प्रकाशित हो जाते हैं। (श्रुति कहती है कि ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मरूप होता है) ऐसे परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं। ॥१६॥
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥

भावार्थ: जैसे कोई दयालु पुरुष फंदे में पड़े हुए पशु का बन्धन काट दे, वैसे ही आप मेरे-जैसे शरण में आए हुए भक्तों की जन्म-मृत्यु रूपी फांसी काट देते हैं। आप नित्यमुक्त हैं, परम करुणामय हैं और भक्तों का कल्याण करने में कभी आलस्य नहीं करते, तत्काल आप उनका कल्याण करते हैं। आपके चरणों में मेरा नमस्कार है। समस्त प्राणियों के हृदय में अपने अंश के द्वारा अन्तरात्मा के रूप में आप सदैव उपलब्ध होते रहते हैं। आप समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण एवं अनन्त हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूं। ॥१७॥
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥

भावार्थ: जो लोग शरीर, पुत्र, गुरुजन, गृह, सम्पत्ति और स्वजनों में आसक्त हैं- वे आपको प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि आप स्वयं गुणों की आसक्ति से रहित हैं। जीवनमुक्त पुरुष अपने हृदय में आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। उन सभी ऐश्वर्यों से परिपूर्ण ज्ञानस्वरूप भगवान् को मैं नमस्कार करता हूं ॥१८॥
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥

भावार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कामना से मनुष्य जिनका भजन करके अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेते हैं। इतना ही नहीं, वे उनको सभी प्रकार का सुख भी प्रदान करते हैं और अपने ही जैसा अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं, वे ही परम दयालु प्रभु मेरा उद्धार करें ॥१९॥
एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम्
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥

भावार्थ: जिनके अनन्य प्रेमी भक्तजन उन्हीं की शरण में रहते हुए उनसे किसी भी वस्तु की- यहां तक कि मोक्ष की भी अभिलाषा नहीं करते, केवल उनकी परम दिव्य मंगलमयी लीलाओं का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में निमग्न रहते हैं ॥२०॥
तमक्षरं ब्रह्मपरं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥

भावार्थ: जो अविनाशी, सर्वशक्तिमान, अव्यक्त, इन्द्रियातीत और अत्यन्त सूक्ष्म हैं; जो अत्यन्त निकट रहने पर भी बहुत दूर जान पड़ते हैं; जो आध्यात्मिक योग अर्थात् ज्ञानयोग या भक्तियोग के द्वारा प्राप्त होते हैं- उन्हीं आदिपुरुष, अनन्त एवं परिपूर्ण परब्रह्म परमात्मा की मैं स्तुति करता हूं ॥२१॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥

भावार्थ: जिनकी अत्यन्त सूक्ष्म एवं छोटी-सी कला से अनेकों नाम-रूप के भेदभाव को रखते हुए, विविधता से युक्त, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण आदि देवगण, चारों वेद तथा चराचर लोकों की सृष्टि हुई, वे भगवान् सर्वोत्कृष्ट हैं, मैं उनकी शरण में हूं ॥२२॥
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।
तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥

भावार्थ: जैसे दहकती हुई अग्नि से लपटें उठती हैं तथा देदीप्यमान् सूर्य से उसकी किरणें निरंतर निकलती हैं और फिर उन्हीं में विलीन होती रहती हैं, वैसे ही जिन स्वयं प्रकाश परमात्मा से बुद्धि, मन, इन्द्रियां और शरीर, जो कि एकमात्र गुणों के प्रवाह रूप में हैं, बार-बार प्रकट होते हैं और लीन होते जाते हैं, उन भगवान् की जय हो! जय हो! ॥२३॥
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्
न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥

भावार्थ: वे भगवान् न तो देवता हैं, न असुर हैं, वे मनुष्य या पशु-पक्षी भी नहीं हैं, न वे स्त्री हैं, न पुरुष और न ही नपुंसक हैं। वे कोई साधारण या असाधारण नृसिंह जैसे प्राणी भी नहीं हैं। न वे गुण हैं तथा न कर्म हैं, न कार्य हैं, न ही कारण हैं। प्रलयकाल में सबका निषेध हो जाने पर, जो बाकी बचा रहता है, वही उनका स्वरूप है। साथ ही वे सब कुछ भी हैं। वे ही सर्वान्तर्यामि परमात्मा मेरे उद्धार के लिये प्रकट हों, यही मेरी प्रार्थना है ॥२४॥
जिजीविषे नाहिमहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चवृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥

भावार्थ: मैं जीना नहीं चाहता। यह हाथी की योनि बाहर और भीतर-सब ओर से अज्ञानरूप आवरण के द्वारा ढकी हुई है, इसको रखकर करना ही क्या है अर्थात् मैं इस योनि में नहीं रहना चाहता हूं। मैं तो आत्मप्रकाश को ढकने वाले उस अज्ञान रूप आवरण से छूटना चाहता हूं, जो कालक्रम से अपने-आप नहीं छूट सकता, जो केवल भगवत्कृपा अथवा तत्त्वज्ञान के द्वारा ही नष्ट होता है ॥२५॥
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥

भावार्थ: इसलिए मैं उन परब्रह्म परमात्मा की शरण में हूं जो विश्व से अछूते होकर भी विश्व के रचयिता और विश्व स्वरूप हैं- साथ ही जो विश्व की अन्तरात्मा के रूप में विश्वरूप सामग्री से लीला भी करते रहते हैं, उन अजन्मा परमपद-स्वरूप ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूं ॥२६॥
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥

भावार्थ: योगीजन योग के द्वारा कर्म, कर्म-वासना और कर्मफल को भस्म करके अपने शुद्ध हृदय में जिन योगेश्वर भगवान् का साक्षात्कार करते हैं– उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूं। ॥२७॥
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥

भावार्थ: प्रभो! आपकी तीन शक्तियों-सत्त्व, रज और तम के रागादि वेग असह्य हैं। और फिर समस्त इन्द्रियों और मन के विषयों के रूप में भी तो आप ही प्रतीत हो रहे हैं। इसलिए जिनकी इन्द्रियां वश में नहीं हैं, वे तो आपकी प्राप्ति का मार्ग भी नहीं पा सकते। आपकी शक्ति अनन्त है। आप शरणागत वत्सल हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूं ॥२८॥
नायं वेद स्वमात्मनं यच्छक्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥

भावार्थ: अहं बुद्धि रूप आपकी माया अर्थात् अहंबुद्धि से आत्मा का स्वरूप ढक गया है, जिससे यह जीव अपने स्वरूप को नहीं जान पाता। आपकी महिमा अपार है। उन सर्वशक्तिमान् एवं माधुर्यनिधि भगवान् की मैं शरण में हूं ॥२९॥
श्री शुक उवाच
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात्
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥

भावार्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं, हे परीक्षित्! गजेन्द्र ने बिना किसी भेदभाव के निर्विशेष रूप से भगवान् की स्तुति की थी, इसलिये भिन्न-भिन्न नाम और रूप को अपना स्वरूप माननेवाले ब्रह्मा आदि देवता ग्राह के ग्रास से मुक्त करने नहीं आए। उस समय सर्वात्मा होने के कारण सर्वदेव स्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि वहां अपने ऐश्वर्य के साथ प्रकट हो गये ॥३०॥
तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान-
चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥

भावार्थ: विश्व के एक मात्र आधार भगवान् ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। अतः उसकी स्तुति सुनकर वेदमय गरुड़ पर सवार हो चक्रधारी भगवान् बड़ी शीघ्रता से उस स्थान की ओर चल पड़े, जहां गजेन्द्र अत्यन्त संकट में पड़ा हुआ था। उनके साथ स्तुति करते हुए देवता भी आ गए। ॥३१॥
सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा-
नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥

भावार्थ: सरोवर के भीतर बलवान् ग्राह ने गजेन्द्र को पकड़ रखा था और वह अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। जब उसने देखा कि आकाश में गरुड़ पर सवार होकर हाथ में चक्र लिये भगवान् श्रीहरि आ रहे हैं, तब अपनी सूंड में कमल का एक सुन्दर पुष्प लेकर उसने ऊपर को उठाया और बड़े कष्ट से बोला- 'नारायण! जगद्गुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है' ॥३२॥
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥

भावार्थ: जब भगवान् ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीडित हो रहा है, तब वे एकबारगी गरुड़ को छोड़कर कूद पड़े और कृपा करके गजेन्द्र के साथ ही ग्राह को भी बड़ी शीघ्रता से सरोवर से बाहर निकल लाये। फिर सब देवताओं के सामने ही भगवान् श्रीहरि ने चक्र से ग्राह का मुंह फाड़ डाला और गजेन्द्र को मुक्त कर दिया। ॥३३॥
गजेंद्र मोक्ष कथा न केवल एक धार्मिक कथा है, बल्कि यह हमें सिखाती है कि जीवन में जब कठिनाइयाँ आएं, तो हमें अहंकार त्यागकर प्रभु की शरण लेनी चाहिए। गजेंद्र स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति को मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है और उसे मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। इस प्रकार, गजेंद्र मोक्ष हिंदू धर्म में भक्ति, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बना हुआ है।

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